नवतारा (नोवा, Nova) उस तारे को कहते हैं जो एकाएक चमक उठता है और पुन: धीरे-धीरे अपनी पहले जैसी धूमिल अथवा अदृश्य दशा में पहुँच जाता है। ऐसे तारे को कभी कभी 'अस्थायी तारा' भी कहते हैं।

नवतारे की चमक बड़ी तेजी से बढ़ती है, यहाँ तक कि दो तीन दिन में अथवा इससे भी कम समय में कई हजार गुनी बढ़ जाती है, परंतु चमक के घटने में काफी समय लगता है। परमाधिक चमक की अवस्था प्राप्त हो जाने पर तुरंत चमक का घटना प्रारंभ हो जाता है। आरंभ में चमक बड़ी तेजी से घटती है, परंतु कुछ समय बाद चमक के घटने की गति मंद पड़ जाती है। चमक के घटते समय चमक के उतार चढ़ाव भी होता रहता है। तारे को अपनी पूर्वस्थिति प्राप्त करने में साधारणत: १० से २० वर्ष तक लगते हैं।

नवतारे के स्पेक्ट्रम अध्ययन से विदित होता है कि चमक बढ़ने पर तारा ऐसी गैसों में आच्छादित हो जाता है जिनका वेग अत्यधिक होता है। तारे के चारों ओर फैलती हुई गैसों के कारण ग्रहीय नीहारिका के समान बिंब दिखाई पड़ता है, जो कई वर्षों तक बढ़ता रहता है और फिर मिट जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नवतारे को आच्छादित करनेवाली गैसें तारे के अंदर होनेवाले विस्फोट से उत्पन्न होती है।

नवतारे साधारणत: अपने जीवनकाल में केवल एक बार प्रस्फुटित होकर शांत हो जाते हैं, परंतु तीन तारे ऐसे भी देखे जा चुके हैं, जो एक से अधिक बार प्रस्फुटित हुए हैं। ये नवतारे 'आर-एस ओफ्युची', 'टी कारोनी वोरियालिस' (Coronae Borealis) और 'टी पिक्सिडिस' है। इनमें से पहले दो, दो बार प्रस्फुटित हो चुके हैं और तीसरा चार बार। बार-बार प्रस्फुटित होनेवाले तारे को 'आवर्तक नवतारा' (recurrent nova) कहते हैं।

किसी किसी तारे में नवतारे के लक्षण सदैव पाए जाते हैं। ऐसे तारे को 'स्थायी नवतारा' कहते हैं। ऐसे तारे का सबसे अच्छा उदाहरण 'पी सिग्नी' (Cygni) हैं।

कोई-कोई नवतारा प्रस्फुटन के समय इतना चमकदार हो जाता है कि वह जिस आकाशगंगा में स्थित होता है उसकी संपूर्ण चमक का मुकाबला करने लगता है। ऐसे नवतारे को 'अधिनवतारा' (Supernova) कहते हैं। अधिनवतारे अधिकतर अगांग नीहारिकाओं में मिलते हैं, परंतु हमारी अपनी आकाशगंगा में ऐसे तारों का अभाव नहीं है। पिछले ९०० वर्षों में तीन अधिनवतारे हमारी आकाशगंगा में देखे जा चुके हैं, जिनमें से पहला १०५४ ई. में देखा गया था जो अब एक बढ़ती हुई नीहारिका के रूप में है और क्रैव नीहारिका (Crab Nabula) के नाम से प्रसिद्ध है, दूसरा जो सन् १५७२ में कश्यपमंडल में दिखाई पड़ा और टाइको ब्राए (Tycho Brahe) का नवतारा कहलाता है, और तीसरा केपलर (Kepler) का नवतारा है जो सन् १६०४ में दिखाई दिया। सन् १९४४ तक लगभग १०० नवतारों के देखे जाने का उल्लेख मिलता है। ये आकाशगंगा में या उसके आसपास देखे गए हैं। अधिनवतारों की चमक सूर्य की चमक से भी अधिक तेज होती है।

सं.ग्रं. - एल. कैंपबेल ऐंड एल. जक्किया : दि स्टोरी ऑव वेरिएबल स्टार्स (१८४१)।

(कृपााश्कंर शुक्ल )