त्रिपिटक भगवान् बुद्ध के उपदेशों का जिन तीन साहित्यखंडों में संकलन किया गया है, उन्हें समुच्चय रूप से 'त्रिपिटक' कहा जाता है। इन तीन पिटकों के नाम हैं : विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। इनमें ग्रंथों का समावेश निम्न प्रकार किया गया है :

१. विनयपिटक : इसमें पाँच ग्रंथ समाविष्ट हैं -- पाराजिक, पाचित्तिय, महावग्ग, चुल्लवग्ग और परिवार। इनमें से प्रथम दो को सामान्य रूप से विभंग या सुत्तविभंग की संज्ञा दी गई है, और तीसरे व चौथे को खंधक की। पाराजिक में उन घोर अपराधों का विवरण है जिनका दंड संघ से बहिष्कार बतलाया गया है। पाचित्तिय में अपेक्षाकृत उन हीन अपराधों की गणना की गई है, जिनका शोधन प्रायश्चित द्वारा कराया जा सकता है। इन दोनों प्रकार के कुल अपराधों की संख्या २२७ है। इन अपराधों को करनेवाले भिक्षुओं भिक्षुणियों की अपेक्षा से सुत्तविभंग के भिक्षुविभंग या महाविभंग और भिक्खुणी पाति-मोक्ख में किया गया है। जिस प्रकार विभंग में बौद्ध संघ के निषेधात्मक नियमों का संग्रह है, उसी प्रकार खंधक में विधानात्मक नियमों का संकलन किया गया है। महावग्ग में १० स्कंधक हैं, जिनमें भिक्षु की दीक्षा, उपोसथ, वर्षावास, आदि संबंधी नियमों का विधान है; प्रसंगवश भगवान् बुद्ध की बोधिप्राप्ति, धर्मचक्रप्रवर्तन आदि का भी ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। चुल्लवग्ग के प्रथम नौ स्कंधकों में भिक्षुजीवन संबंधी अपेक्षाकृत छोटी छोटी बातों के नियम बतलाए गए हैं, और १०वें स्कंधक से भिक्षुणियों के लिये उपयोगी नियम दिए गए हैं। परिवार में १९ ऐसे परिच्छेद हैं जिनमें विनय संबंधी विषय की प्रश्नोत्तरों, विषयसूचियों, परिशिष्टों आदि के रूप में पुनरावृत्ति की गई है, और इस पकार अपनी रचना में वेद वेदांगों की अनुक्रमणियें व परिशिष्टों से मेल खाते हैं।

२. सुत्त टिक : इसके निम्नलिखित पाँच विभाग हैं -- दीघ-निकाय, मज्झिमनिकाय, संयुक्तनिकाय, अंगुत्तरनिकाय और खुद्दकनिकाय। दीघनिकाय में ३४ बड़े बड़े सुत्तों का संग्रह किया गया है, जिनमें बुद्ध भगवान के आख्यानात्मक उपदेशों का विवरण है। इसके आदि के दो -- ब्रह्मजाल और श्रामण्यफल -- सुत्त बुद्धकालीन दार्शनिक परंपराओं एवं तीर्थकरों के परिचय के लिये बड़े महत्वपूर्ण हैं। सुप्रसिद्ध महापरिनिब्बान सुत्त भी इसी के अंतर्गत है। मज्झिमनिकाय में मध्यम आकार के १५२ सुत्त संगृहीत हैं जो मूल परियाय, सीहनाद, ओपम्म आदि १५ वर्गों में विभाजित हैं। इनमें हमें बुद्ध के उपदेशों एवं उद्गारों का सर्वोत्तम परिचय मिलता है तथा तत्कालीन भौगोलिक, ऐतिहासिक आदि अवस्थाओं की बहुत सी सूचनाएँ मिलती हैं। संयुक्तनिकाय में छोटे बड़े २८८९ सुत्त हैं जिन्हें हम संक्षिप्त बुद्धप्रवचन कह सकते हैं। इनमें हमें यत्र तत्र ग्रामीण जीवन, लोकाख्यान, काव्य तथा नाटकीयता की भी अच्छी झलक मिल जाती है। सुत्तों का विभाजन अगाथ, निदान, खंध, सडायतन और महावग्ग इन पाँच वर्गों में किया गया है। अंगुत्तरनिकाय में एककनिपात, दुकनिपात, तिकनिपात आदि से क्रम से ११ निपात हैं और प्रत्येक निपात पुन: वर्गों में विभाजित है जिनकी कुल संख्या १६९ है। प्रत्येक वर्ग में कम से कम सात एवं अधिक से अधिक २६२ सुत्त हैं। इस प्रकार कुल सुत्तों की संख्या २३०८ है। एककनिपात में केवल ऐसे उपदेश संकलित हैं, जिनका संबंध एक संख्या से है। दुकनिपात में दो संख्यावाले पदार्थों का उल्लेख है, जैसे दो त्याज्य वस्तुएँ, दो प्रकार के ज्ञानी, दो प्रकर के बल इत्यादि। इसी प्रकार चलते हुए ११वें निपात में निर्वाण प्रप्ति के ११ उपाय बतलाए गए हैं। सुत्तों में संख्यात्मक सूचियाँ मात्र नहीं हैं, उनमें उपदेश की सरसता और सजीवता है। खुद्दनिकाय में निम्न १५ ग्रंथों का समावेश है -- १. खुद्दकपाठ, जिसमें तीन शरण, १० शिक्षाप्रद, ३२ शरीर के अंग, मंगल सुत्त, रतन सुत्त तिरेकुड्ड सुत्त, निधिकंड और मेत्तसुत्त, इनका समावेश है। २. धम्मपद में यमक, अप्पमाद, आदि ब्राह्मण वग्ग पर्यंत २६ वर्गों में ४२३ ऐसी गाथों का संकलन है, जो स्वयं भगवान् बुद्ध द्वारा की गई मानी जाती हैं। यह ग्रंथ बौद्ध साहित्य में सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध है। ३. उदार बुद्ध के मुख से समय समय पर निकले हुए मनोहर वाक्यों का संग्रह है। इसमें आठ वर्ग हैं एवं प्रत्येक वर्ग में १० सुत्त हैं। केवल ७वें वर्ग में नौ हैं। ४. इतिवुत्तक में बुद्ध के छोटे छोटे नीतिविषयात्मक ११२ प्रवचन संगृहीत हैं। इतिवुत्तक का अर्थ है 'ऐसा भगवान् द्वारा कहा गया'। ५. सुत्तनिपात में पाँच वर्ग तथा कुल ७१ सुत्त हैं। सभी वर्ग गाथात्मक हैं और बौद्धर्ध, साहित्य तथा भाषा की दृष्टि से बड़े महत्वपूर्ण हैं। अशोक ने अपने भाब्रू अभिलेख में जिन सात बुद्ध उपदेशों का उल्लेख किया है उनमें से तीन अर्थात् मौनेय, मुनिगाथा एवं उपतिष्य प्रश्न इसी ग्रंथ में संगृहीत हैं। ६. विमानवत्यु में ८५ देवावासों का वर्णन है, जिनके द्वारा अच्छे कर्मों का फल स्वर्गों का सुख बतलाया गया है। उसी प्रकार ७. पेतवत्यु में ५० प्रेतों की कहानियों द्वारा बुरे कर्मों से उत्पन्न प्रेतयोनि और वहाँ के दु:खों का वर्णन किया गया है। ८. थेरगाथा में १२७९ गाथाएँ हैं और उनमें प्रकृति और जीवन की नाना दशाओं से उद्भूत २५५ भिक्षुओं के वैराग्यभाव का प्ररूपण किया गया है। उसी प्रकार ९. थेरीगाथा की ५२२ गाथाओं में ७३ भिक्षुणियों में आत्मानुभवों का उन्हीं के मुख से व्याख्यान कराया गया है। ये दोनों रचनाएँ अपने ढंग की अपूर्व हैं। १०. जातक में बुद्ध के पूर्वजन्मों की वे ५४७ कहानियाँ है, जिन्होंने भारतीय ही नहीं, बल्कि अखिल विश्व के कथासाहित्य को प्रभावित किया है। ११. निद्देस एक प्रकार से सुत्तनिपात के कुछ वर्गों की अaकथा मात्र है। यह सारिपुत्र की रचना कही गई है। इसमें स्थानों, देशों, बंदरगाहों आदि के उल्लेख महत्वपूर्ण हैं। १२. पटिसंभिदामग्ग में अर्थ, धर्म, शब्द एवं ज्ञानदर्शन इन चार प्रतिसंविदों का निरूपण है, जिससे यह ग्रंथ अभिधम्मपिटक से संबद्ध प्रतीत होता है। १३ अवदान में जातकों के समान भिक्षुओं और भिक्षुणियों के पूर्वजन्म संबंधी सत्कार्यों का वर्णन है। इन्हीं के आधार से सुप्रसिद्ध संस्कृत अवदान साहित्य उत्पन्न हुआ है। १४. बुद्धवंस में गौतम बुद्ध के अतिरिक्त पुराणों के समान उनके २४ अवतारों का वर्णन है। १५. चरियापिटक में यह दिखलाया गया है कि बुद्ध ने किस प्रकर अपने पूर्वजन्म की नाना चरियायों द्वारा दान शीलादि पारमिताओं को पूरा किया। यह सुत्तपिटक के विभागों और उपविभागों का परिचय है।

३. अभिधम्मपिटक : में बौद्ध तत्वचिंतन निम्नांकित सात भागों में उपस्थित किया गया है। १. धम्मसंगणि में भौतिक जगत् की अवस्थाओं का वर्णन है और २. विभंग में उन्हीं का वर्गीकरण। ३. में महासंधिक आदि १७ बौद्ध संप्रदायों का २१६ शंकासमाधानों के रूप में सिद्धांतनिरूपण तथा स्थविरवाद की दृष्टि से खंडन किया है। ४. पुग्गलपण्णति में सुत्तपिटक के आधार से बौद्ध धर्म की दार्शनिक पृष्ठभूमि समझाई गई है, और ५. धातुकथा में विशेष दार्शनिक विषयों पर प्रकश डाला गया है। ६. यमक में अनुकूल प्रतिकूल प्रश्नों के जोड़ों के रूप में धार्मिक परिभाषाएँ एवं उनका व्याख्यान उपस्थित किया गया है। ७. पaाण में २४ प्रत्यय स्थानों के विवेचन द्वारा बौद्ध दर्शन के सुप्रसिद्ध प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धांत का निरूपण किया गया है। (विंटरनित्स हिo)

संo ग्रंo -- विंटरनित्स : हिस्ट्री ऑव संस्कृत लिटरेचर, भाग २; ला : हिस्ट्री ऑव पालि लिटरेचर; भरतसिंह उपाध्याय : 'पालि भाषा और साहित्य विषयक लेख।' [हीरालाल बालचंद]